श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 255: कर्ण और पुरोहितकी सलाहसे दुर्योधनकी वैष्णवयज्ञके लिये तैयारी  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  3.255.16-17 
तेन त्वं यज राजेन्द्र शृणु चेदं वचो मम।
य इमे पृथिवीपाला: करदास्तव पार्थिव॥ १६॥
ते करान् सम्प्रयच्छन्तु सुवर्णं च कृताकृतम्।
तेन ते क्रियतामद्य लाङ्गलं नृपसत्तम॥ १७॥
 
 
अनुवाद
'राजन्! आप इसी से भगवान् का पूजन करें और इस विषय में मेरी बात सुनें। पृथ्वीनाथ! जो भी राजा आपको कर देते हैं, उन्हें आदेश दीजिए कि वे आपको सोने के आभूषण और कर के रूप में सोना ही अर्पित करें। हे राजश्रेष्ठ! उस सोने से एक हल बनवाएँ।॥16-17॥
 
‘King! You should worship God with that and listen to what I have to say in this regard. Prithvinath! All those kings who pay you taxes, order them to offer you ornaments made of gold and gold as tax. O best of kings! Get a plough made from that gold.॥ 16-17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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