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mahabharat 3.254.34-35: शत्रुघ्न जनमेजय! धर्म को जानने वाले वीर कर्ण ने भीतरी प्रांगण में प्रवेश किया और गांधारी सहित धृतराष्ट्र को देखकर पुत्र के समान उनके चरण पकड़ लिए। धृतराष्ट्र ने भी प्रेमपूर्वक उन्हें गले लगाकर विदा किया।   |   mahabharat अध्याय 3.254: कर्णके द्वारा सारी पृथ्वीपर दिग्विजय और हस्तिनापुरमें उसका सत्कार   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 254: कर्णके द्वारा सारी पृथ्वीपर दिग्विजय और हस्तिनापुरमें उसका सत्कार  »  श्लोक 34-35
 
 
श्लोक  3.254.34-35 
प्रविश्य च गृहं राजन्नभ्यन्तरमरिंदम।
गान्धारीसहितं वीरो धृतराष्ट्रं ददर्श स:॥ ३४॥
पुत्रवच्च नरव्याघ्र पादौ जग्राह धर्मवित्।
धृतराष्ट्रेण चाश्लिष्य प्रेम्णा चापि विसर्जित:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
शत्रुघ्न जनमेजय! धर्म को जानने वाले वीर कर्ण ने भीतरी प्रांगण में प्रवेश किया और गांधारी सहित धृतराष्ट्र को देखकर पुत्र के समान उनके चरण पकड़ लिए। धृतराष्ट्र ने भी प्रेमपूर्वक उन्हें गले लगाकर विदा किया।
 
Shatrughan Janamejaya! The brave Karna, who knew Dharma, entered the inner palace and saw Dhritarashtra along with Gandhari and like a son, he held both their feet. Dhritarashtra also embraced him lovingly and bid him farewell.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)