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mahabharat 3.253.5-6h: वीर! शत्रुओं ने तुम्हें बलपूर्वक वहाँ पकड़ लिया था और धर्मज्ञ पाण्डवों ने तुम्हें उस संकट से बचाया था। क्या अब भी तुम्हें लज्जा नहीं आती?॥5 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 3.253: भीष्मका कर्णकी निन्दा करते हुए दुर्योधनको पाण्डवोंसे संधि करनेका परामर्श देना, कर्णके क्षोभपूर्ण वचन और दिग्विजयके लिये प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 253: भीष्मका कर्णकी निन्दा करते हुए दुर्योधनको पाण्डवोंसे संधि करनेका परामर्श देना, कर्णके क्षोभपूर्ण वचन और दिग्विजयके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 5-6h
 
 
श्लोक  3.253.5-6h 
तत: प्राप्तं त्वया वीर ग्रहणं शत्रुभिर्बलात्॥ ५॥
मोक्षितश्चासि धर्मज्ञै: पाण्डवैर्न च लज्जसे।
 
 
अनुवाद
वीर! शत्रुओं ने तुम्हें बलपूर्वक वहाँ पकड़ लिया था और धर्मज्ञ पाण्डवों ने तुम्हें उस संकट से बचाया था। क्या अब भी तुम्हें लज्जा नहीं आती?॥5 1/2॥
 
Valiant! The enemies forcefully captured you there and the Dharma-knowledgeable Pandavas rescued you from that danger. Are you still not ashamed?॥ 5 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)