श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 253: भीष्मका कर्णकी निन्दा करते हुए दुर्योधनको पाण्डवोंसे संधि करनेका परामर्श देना, कर्णके क्षोभपूर्ण वचन और दिग्विजयके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 28-29
 
 
श्लोक  3.253.28-29 
प्रययौ च महेष्वासो नक्षत्रे शुभदैवते।
शुभे तिथौ मुहूर्ते च पूज्यमानो द्विजातिभि:॥ २८॥
मङ्गलैश्च शुभै: स्नातो वाग्भिश्चापि प्रपूजित:।
नादयन् रथघोषेण त्रैलोक्यं सचराचरम्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् महाधनुर्धर कर्ण शुभ मंगल द्रव्यों से युक्त जल में स्नान करके, दोनों वर्णों के मंगलमय वचनों से सम्मानित और स्तुतियुक्त होकर शुभ नक्षत्र, शुभ तिथि और शुभ समय में भ्रमण कर रहा था। उस समय वह अपने रथ की गर्जना से विचरण करने वाले भूतगणों सहित सम्पूर्ण त्रिलोकी को गुंजायमान कर रहा था।
 
Thereafter, the great archer Karna, after bathing in water with auspicious auspicious substances, was honored and praised by the blessed words of the two castes and traveled in an auspicious constellation, auspicious date and auspicious time. At that time he was echoing the entire Triloki along with the roaming ghosts with the roar of his chariot. 28-29॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि कर्णदिग्विजये त्रिपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २५३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें कर्णदिग्विजयविषयक

दो सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २५३॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)