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mahabharat 3.253.25: वीर! मैं धन्य हूँ, मैं आपकी कृपा का पात्र हूँ; क्योंकि आप जैसे पराक्रमी मित्र सदैव मेरे हित में लगे रहते हैं। आज मेरा जीवन धन्य हो गया॥ 25॥   |   mahabharat अध्याय 3.253: भीष्मका कर्णकी निन्दा करते हुए दुर्योधनको पाण्डवोंसे संधि करनेका परामर्श देना, कर्णके क्षोभपूर्ण वचन और दिग्विजयके लिये प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 253: भीष्मका कर्णकी निन्दा करते हुए दुर्योधनको पाण्डवोंसे संधि करनेका परामर्श देना, कर्णके क्षोभपूर्ण वचन और दिग्विजयके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  3.253.25 
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे त्वं महाबल:।
हितेषु वर्तसे नित्यं सफलं जन्म चाद्य मे॥ २५॥
 
 
अनुवाद
वीर! मैं धन्य हूँ, मैं आपकी कृपा का पात्र हूँ; क्योंकि आप जैसे पराक्रमी मित्र सदैव मेरे हित में लगे रहते हैं। आज मेरा जीवन धन्य हो गया॥ 25॥
 
Veer! I am blessed, I am worthy of your grace; because mighty friends like you are always engaged in serving my interests. Today my life has been blessed.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)