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mahabharat 3.253.22: जो निंदनीय की निन्दा और अप्रशंसनीय की प्रशंसा करता है, वह भीष्म आज मेरा बल देखकर अपने को शाप दे ॥22॥   |   mahabharat अध्याय 3.253: भीष्मका कर्णकी निन्दा करते हुए दुर्योधनको पाण्डवोंसे संधि करनेका परामर्श देना, कर्णके क्षोभपूर्ण वचन और दिग्विजयके लिये प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 253: भीष्मका कर्णकी निन्दा करते हुए दुर्योधनको पाण्डवोंसे संधि करनेका परामर्श देना, कर्णके क्षोभपूर्ण वचन और दिग्विजयके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.253.22 
अनिन्द्यं निन्दते यो हि अप्रशंस्यं प्रशंसति।
स पश्यतु बलं मेऽद्य आत्मानं तु विगर्हतु॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जो निंदनीय की निन्दा और अप्रशंसनीय की प्रशंसा करता है, वह भीष्म आज मेरा बल देखकर अपने को शाप दे ॥22॥
 
He who criticises the condemnable and praises the unpraiseworthy, that Bhishma should see my strength today and curse himself. ॥22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)