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mahabharat 3.253.17: हे महाबाहु! वह आपसे द्वेष रखता है, इसलिए मुझसे भी द्वेष रखता है। हे मनुष्यों के स्वामी! वह आपके सामने सदैव मेरी निन्दा करता है॥17॥   |   mahabharat अध्याय 3.253: भीष्मका कर्णकी निन्दा करते हुए दुर्योधनको पाण्डवोंसे संधि करनेका परामर्श देना, कर्णके क्षोभपूर्ण वचन और दिग्विजयके लिये प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 253: भीष्मका कर्णकी निन्दा करते हुए दुर्योधनको पाण्डवोंसे संधि करनेका परामर्श देना, कर्णके क्षोभपूर्ण वचन और दिग्विजयके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.253.17 
त्वद् द्वेषाच्च महाबाहो ममापि द्वेष्टुमर्हति।
विगर्हते च मां नित्यं त्वत्समीपे नरेश्वर॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे महाबाहु! वह आपसे द्वेष रखता है, इसलिए मुझसे भी द्वेष रखता है। हे मनुष्यों के स्वामी! वह आपके सामने सदैव मेरी निन्दा करता है॥17॥
 
O mighty-armed one! Because of his hatred for you, he also hates me. O lord of men! He always slanders me in your presence.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)