श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 253: भीष्मका कर्णकी निन्दा करते हुए दुर्योधनको पाण्डवोंसे संधि करनेका परामर्श देना, कर्णके क्षोभपूर्ण वचन और दिग्विजयके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.253.15 
किमस्माकं भवेच्छ्रेय: किं कार्यमवशिष्यते।
कथं च सुकृतं तत् स्यान्मन्त्रयामोऽद्य यद्धितम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
‘मित्रो! ऐसा करने से हमारा क्या भला होगा? हमारे लिए कौन-सा काम शेष रह गया है? हमारे काम का शुभ फल कैसे मिलेगा? हमारा हित किसमें होगा? आज हमें इसी विषय पर विचार करना है।’॥15॥
 
‘Friends! What will be good for us if we do it? What work is left for us to do? How will our work lead to auspicious results? What will be in our interest? Today we have to think about this very topic.’॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)