श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 252: दानवोंका दुर्योधनको समझाना और कर्णके अनुरोध करनेपर दुर्योधनका अनशन त्याग करके हस्तिनापुरको प्रस्थान  »  श्लोक 50-52
 
 
श्लोक  3.252.50-52 
कर्णेन सार्धं राजेन्द्र सौबलेन च देविना।
दु:शासनादयश्चास्य भ्रातर: सर्व एव ते॥ ५०॥
भूरिश्रवा: सोमदत्तो महाराजश्च बाह्लिक:।
रथैर्नानाविधाकारैर्हयैर्गजवरैस्तथा॥ ५१॥
प्रयान्तं नृपसिंहं तमनुजग्मु: कुरूद्वहा:।
कालेनाल्पेन राजेन्द्र स्वपुरं विविशुस्तदा॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
राजा! कर्ण और द्यूत-विद्या में निपुण शकुनि, दु:शासन, भूरिश्रवा, सोमदत्त और महाराज बाह्लीक आदि सभी भाइयों के साथ-साथ कुरुवंश के ये सभी रत्न नाना प्रकार के रथों, हाथियों और घोड़ों पर बैठकर राजासिंह दुर्योधन के पीछे-पीछे चल रहे थे। जनमेजय! कुछ ही देर में वे सभी अपनी राजधानी हस्तिनापुर में प्रवेश कर गए।
 
King! Karna and the gambling expert Shakuni along with all the brothers like Dushasan, Bhurishrava, Somadatta and Maharaja Bahlik - all these gems of the Kuru clan were following the king's lion Duryodhana sitting on various types of chariots, elephants and horses. Janamejaya! In a short time all of them entered their capital Hastinapur. 50-52.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनपुरप्रवेशे द्विपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २५२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनका नगरमें प्रवेशविषयक

दो सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २५२॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ५३ १/२ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)