श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 252: दानवोंका दुर्योधनको समझाना और कर्णके अनुरोध करनेपर दुर्योधनका अनशन त्याग करके हस्तिनापुरको प्रस्थान  »  श्लोक 33-34h
 
 
श्लोक  3.252.33-34h 
एवमाशा दृढा तस्य धार्तराष्ट्रस्य दुर्मते:॥ ३३॥
विनिर्जये पाण्डवानामभवद् भरतर्षभ।
 
 
अनुवाद
जनमेजय! इस प्रकार उस मूर्ख धृतराष्ट्रपुत्र के मन में पाण्डवों पर विजय पाने की प्रबल आशा उत्पन्न हो गयी। 33 1/2
 
Janamejaya! In this way that foolish son of Dhritarashtra developed a strong hope of gaining victory over the Pandavas. 33 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)