श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 252: दानवोंका दुर्योधनको समझाना और कर्णके अनुरोध करनेपर दुर्योधनका अनशन त्याग करके हस्तिनापुरको प्रस्थान  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  3.252.27-28 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा परिष्वज्य दैत्यास्तं राजकुञ्जरम्।
समाश्वास्य च दुर्धर्षं पुत्रवद् दानवर्षभा:॥ २७॥
स्थिरां कृत्वा बुद्धिमस्य प्रियाण्युक्त्वा च भारत।
गम्यतामित्यनुज्ञाय जयमाप्नुहि चेत्यथ॥ २८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन! वीर एवं पराक्रमी दुर्योधन से ऐसा कहकर दैत्यों और दानवों ने उसे पुत्र के समान अपने हृदय में धारण कर लिया और आश्वासन देकर उसके मन को स्थिर किया। तत्पश्चात् प्रेमपूर्वक वचन कहते हुए उन्होंने दुर्योधन को जाने की आज्ञा दी और कहा- 'अब तुम जाकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त करो।' ॥27-28॥
 
Vaishampayanji says- Rajan! Saying this to Duryodhana, the brave and brave man, the demons and demon lords took him to their heart like a son and stabilized his mind by giving assurance. India After that, speaking loving words, he ordered Duryodhana to go and said - 'Now you go and conquer the enemies'. 27-28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)