श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 251: शकुनिके समझानेपर भी दुर्योधनको प्रायोपवेशनसे विचलित होते न देखकर दैत्योंका कृत्याद्वारा उसे रसातलमें बुलाना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  3.251.7 
यत्र हर्षस्त्वया कार्य: सत्कर्तव्याश्च पाण्डवा:।
तत्र शोचसि राजेन्द्र विपरीतमिदं तव॥ ७॥
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! जहाँ तुम्हें पांडवों का स्वागत और आनन्द मनाना चाहिए था, वहाँ तुम शोक मना रहे हो। तुम्हारा यह व्यवहार ठीक उल्टा है।
 
Rajendra! Where you should have been rejoicing and welcoming the Pandavas, you are mourning. This behaviour of yours is just the opposite.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)