श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 251: शकुनिके समझानेपर भी दुर्योधनको प्रायोपवेशनसे विचलित होते न देखकर दैत्योंका कृत्याद्वारा उसे रसातलमें बुलाना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.251.5 
अतिभीरुमतिक्लीबं दीर्घसूत्रं प्रमादिनम्।
व्यसनाद् विषयाक्रान्तं न भजन्ति नृपं प्रजा:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
जो राजा अत्यन्त डरपोक, कायर, आलसी, लापरवाह और बुरी आदतों के कारण सांसारिक सुखों में उलझा हुआ है, उसे प्रजा अपना स्वामी नहीं मानती ॥5॥
 
A king who is very timid, cowardly, lazy, careless and entangled in worldly pleasures due to bad habits is not accepted by the people as their lord. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)