श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 251: शकुनिके समझानेपर भी दुर्योधनको प्रायोपवेशनसे विचलित होते न देखकर दैत्योंका कृत्याद्वारा उसे रसातलमें बुलाना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.251.18 
वैशम्पायन उवाच
स सुहृद्भिरमात्यैश्च भ्रातृभि: स्वजनेन च।
बहुप्रकारमप्युक्तो निश्चयान्न विचाल्यते॥ १८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! दुर्योधन के मित्रों, मन्त्रियों, भाइयों और सम्बन्धियों ने उसे बहुत समझाया, परन्तु कोई भी उसका निश्चय नहीं बदल सका॥18॥
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! Duryodhan's friends, ministers, brothers and relatives tried to convince him a lot, but nobody could make him change his resolve.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)