श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 251: शकुनिके समझानेपर भी दुर्योधनको प्रायोपवेशनसे विचलित होते न देखकर दैत्योंका कृत्याद्वारा उसे रसातलमें बुलाना  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  3.251.16-17 
त एवमुक्ता: प्रत्यूचू राजानमरिमर्दनम्॥ १६॥
या गतिस्तव राजेन्द्र सास्माकमपि भारत।
कथं वा सम्प्रवेक्ष्यामस्त्वद्विहीना: पुरं वयम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
ऐसा उत्तर पाकर सब मित्रों ने शत्रुनाशक राजा दुर्योधन से कहा, 'राजन्! जो तुम्हारा भाग्य होगा, वही हमारा भी होगा। भरत! तुम्हारे बिना हम हस्तिनापुर में कैसे प्रवेश करेंगे?'॥16-17॥
 
On receiving such an answer, all the friends said to the enemy-destroyer, King Duryodhana, 'King! Whatever be your fate, the same will be ours. Bharata! How will we enter Hastinapur without you?'॥ 16-17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)