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mahabharat 3.25.1: वैशम्पायन कहते हैं, 'जनमेजय! सुख भोगने के योग्य पाण्डव राजकुमार इन्द्र के समान तेजस्वी थे। वनवास का संकट उपस्थित होने पर वे द्वैतवन में प्रवेश कर गए और वहाँ सरस्वती के तट पर रमणीय साल वन में निवास करने लगे।'   |   mahabharat अध्याय 3.25: महर्षि मार्कण्डेयका पाण्डवोंको धर्मका आदेश देकर उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 25: महर्षि मार्कण्डेयका पाण्डवोंको धर्मका आदेश देकर उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.25.1 
वैशम्पायन उवाच
तत् काननं प्राप्य नरेन्द्रपुत्रा:
सुखोचिता वासमुपेत्य कृच्छ्रम्।
विजह्रुरिन्द्रप्रतिमा: शिवेषु
सरस्वतीशालवनेषु तेषु॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं, 'जनमेजय! सुख भोगने के योग्य पाण्डव राजकुमार इन्द्र के समान तेजस्वी थे। वनवास का संकट उपस्थित होने पर वे द्वैतवन में प्रवेश कर गए और वहाँ सरस्वती के तट पर रमणीय साल वन में निवास करने लगे।'
 
Vaishampayana says, 'Janamejaya! The Pandava princes, who were worthy of enjoying pleasures, were as radiant as Indra. Facing the crisis of exile, they entered Dwaitavan and started living there in the pleasant Sal forests on the banks of Saraswati. 1.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)