श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 249: दुर्योधनका कर्णसे अपनी ग्लानिका वर्णन करते हुए आमरण अनशनका निश्चय, दु:शासनको राजा बननेका आदेश, दु:शासनका दु:ख और कर्णका दुर्योधनको समझाना  »  श्लोक 31-33
 
 
श्लोक  3.249.31-33 
विदीर्येत् सकला भूमिर्द्यौश्चापि शकलीभवेत्।
रविरात्मप्रभां जह्यात् सोम: शीतांशुतां त्यजेत्॥ ३१॥
वायु: शैघ्रॺमथो जह्याद्धिमवांश्च परिव्रजेत्।
शुष्येत् तोयं समुद्रेषु वह्निरप्युष्णतां त्यजेत्॥ ३२॥
न चाहं त्वदृते राजन् प्रशासेयं वसुन्धराम्।
पुन: पुन: प्रसीदेति वाक्यं चेदमुवाच ह॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
‘चाहे सारी पृथ्वी फट जाए, आकाश टुकड़े-टुकड़े हो जाए, सूर्य अपना तेज और चंद्रमा अपनी शीतलता छोड़ दे, वायु अपना वेग छोड़ दे, हिमालय अपना स्थान छोड़कर इधर-उधर हिलने लगे, समुद्र का जल सूख जाए और अग्नि अपनी गर्मी छोड़ दे; परंतु मैं आपके बिना इस पृथ्वी पर शासन नहीं करूँगा। हे राजन! अब आप प्रसन्न होइए, प्रसन्न होइए।’ दु:शासन ने यह अंतिम वाक्य बार-बार दोहराया और इस प्रकार कहा—॥31-33॥
 
‘Even if the entire earth bursts apart, the sky breaks into pieces, the sun gives up its brightness and the moon its coolness, the wind gives up its swiftness, the Himalayas leave their place and start moving here and there, the water of the ocean dries up and the fire gives up its heat; but I will not rule this earth without you. O King! Now you be happy, be happy.’ Dushasan repeated this last sentence again and again and said thus—॥31-33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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