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mahabharat 3.249.20: अतः मैं (अवश्य) मृत्युपर्यन्त व्रत करूँगा। अब मैं जीवित नहीं रह सकूँगा। शत्रुओं द्वारा संकट से बचा लिया गया कौन विचारशील मनुष्य जीवित रहना चाहेगा?॥20॥   |   mahabharat अध्याय 3.249: दुर्योधनका कर्णसे अपनी ग्लानिका वर्णन करते हुए आमरण अनशनका निश्चय, दु:शासनको राजा बननेका आदेश, दु:शासनका दु:ख और कर्णका दुर्योधनको समझाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 249: दुर्योधनका कर्णसे अपनी ग्लानिका वर्णन करते हुए आमरण अनशनका निश्चय, दु:शासनको राजा बननेका आदेश, दु:शासनका दु:ख और कर्णका दुर्योधनको समझाना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.249.20 
तस्मात् प्रायमुपासिष्ये न हि शक्ष्यामि जीवितुम्।
चेतयानो हि को जीवेत् कृच्छ्राच्छत्रुभिरुद्‍धृत:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
अतः मैं (अवश्य) मृत्युपर्यन्त व्रत करूँगा। अब मैं जीवित नहीं रह सकूँगा। शत्रुओं द्वारा संकट से बचा लिया गया कौन विचारशील मनुष्य जीवित रहना चाहेगा?॥20॥
 
Therefore I will (definitely) fast till death. I will not be able to live now. Which thoughtful person who has been saved from trouble by his enemies would want to live?॥ 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)