Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.249.17: मैं महान पराक्रम दिखाकर शत्रुओं के सिर और छाती पर खड़ा हुआ था; परन्तु अब अपने ही दोष से नीचे गिरा हूँ। ऐसी दशा में मैं उन माननीय पुरुषों से कैसे बात करूँ?॥17॥ | mahabharat अध्याय 3.249: दुर्योधनका कर्णसे अपनी ग्लानिका वर्णन करते हुए आमरण अनशनका निश्चय, दु:शासनको राजा बननेका आदेश, दु:शासनका दु:ख और कर्णका दुर्योधनको समझाना । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
रिपूणां शिरसि स्थित्वा तथा विक्रम्य चोरसि।
आत्मदोषात् परिभ्रष्ट: कथं वक्ष्यामि तानहम्॥ १७॥
अनुवाद
मैं महान पराक्रम दिखाकर शत्रुओं के सिर और छाती पर खड़ा हुआ था; परन्तु अब अपने ही दोष से नीचे गिरा हूँ। ऐसी दशा में मैं उन माननीय पुरुषों से कैसे बात करूँ?॥17॥
I had displayed great valour and stood on the heads and chests of my enemies; but now I have fallen down due to my own fault. In such a condition how will I talk to those honourable men?॥ 17॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥