श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 247: सेनासहित दुर्योधनका मार्गमें ठहरना और कर्णके द्वारा उसका अभिनन्दन  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  3.247.13-14 
शरक्षताङ्गश्च भृशं व्यपयातोऽभिपीडित:।
इदं त्वत्यद्‍भुतं मन्ये यद् युष्मानिह भारत॥ १३॥
अरिष्टानक्षतांश्चापि सदारबलवाहनान्।
विमुक्तान् सम्प्रपश्यामि युद्धात् तस्मादमानुषात्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
‘मेरा सारा शरीर बाणों से घायल और क्षत-विक्षत हो गया था। मेरे सभी अंगों में बड़ी पीड़ा हो रही थी; इसीलिए मुझे भागना पड़ा। हे भारत! मुझे यह बड़ा ही आश्चर्य लगता है कि आप लोग उस अमानवीय युद्ध से मुक्त होकर अपनी स्त्रियों, सेना और वाहनों सहित यहाँ सुरक्षित और सकुशल दिखाई दे रहे हैं।॥13-14॥
 
‘My whole body was wounded and injured by the arrows. I was in great pain in all my limbs; that is why I had to run away. O Bharata! It seems very strange to me that you people, after being freed from that inhuman war, are seen here safe and unharmed along with your women, army and vehicles.॥ 13-14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)