श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 246: चित्रसेन, अर्जुन तथा युधिष्ठिरका संवाद और दुर्योधनका छुटकारा  »  श्लोक 3-5
 
 
श्लोक  3.246.3-5 
चित्रसेन उवाच
विदितोऽयमभिप्रायस्तत्रस्थेन दुरात्मन:।
दुर्योधनस्य पापस्य कर्णस्य च धनंजय॥ ३॥
वनस्थान् भवतो ज्ञात्वा क्लिश्यमानाननाथवत्।
समस्थो विषमस्थांस्तान् द्रक्ष्यामीत्यनवस्थितान्॥ ४॥
इमेऽवहसितुं प्राप्ता द्रौपदीं च यशस्विनीम्।
ज्ञात्वा चिकीर्षितं चैषां मामुवाच सुरेश्वर:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
चित्रसेन ने कहा - धनंजय! देवराज इन्द्र ने स्वर्ग में बैठे हुए ही दुष्टबुद्धि दुर्योधन और पापी कर्ण का अभिप्राय जान लिया था कि यह जानते हुए भी कि तुम सब लोग वन में रहकर अनाथों के समान कष्ट सह रहे हो और कठिन परिस्थितियों के कारण अस्थिर हो, उन्होंने तुम्हें उस अवस्था में देखकर दुःखी करने का निश्चय किया है। वे स्वयं तो सामान्य (सुखी) अवस्था में हैं, फिर भी वे तुम पाण्डवों और यशस्वी द्रौपदी का उपहास करने के लिए वन में आये हैं। उनकी (तुम सबका अनिष्ट करने की) इच्छा जानकर देवेश्वर इन्द्र ने मुझसे इस प्रकार कहा -॥3-5॥
 
Chitrasena said - Dhananjay! Devraj Indra, while sitting in heaven, had come to know the intention of the evil-minded Duryodhan and the sinful Karna that even after knowing that you all are living in the forest and suffering like orphans and are unstable due to difficult circumstances, they have decided to see you in that condition and make you sad. They themselves are in a normal (happy) state, yet they have come to the forest to make fun of you Pandavas and the famous Draupadi. ​​Knowing their desire (to harm you all), Deveshwar Indra said to me as follows -॥ 3-5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)