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mahabharat 3.246.25-27: दुर्योधन के चले जाने पर वीर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ नीच कुल के लोगों द्वारा प्रशंसित होकर देवताओं के बीच बैठकर, समस्त तपस्वी मुनियों से घिरे हुए, इन्द्र के समान शोभा पाकर द्वैतवन में सुखपूर्वक विहार करने लगे ॥25-27॥   |   mahabharat अध्याय 3.246: चित्रसेन, अर्जुन तथा युधिष्ठिरका संवाद और दुर्योधनका छुटकारा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 246: चित्रसेन, अर्जुन तथा युधिष्ठिरका संवाद और दुर्योधनका छुटकारा  »  श्लोक 25-27
 
 
श्लोक  3.246.25-27 
तस्मिन् गते कौरवेये कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर:॥ २५॥
भ्रातृभि: सहितो वीर: पूज्यमानो द्विजातिभि:।
तपोधनैश्च तै: सर्वैर्वृत: शक्र इवामरै:॥ २६॥
तथा द्वैतवने तस्मिन् विजहार मुदा युत:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
दुर्योधन के चले जाने पर वीर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ नीच कुल के लोगों द्वारा प्रशंसित होकर देवताओं के बीच बैठकर, समस्त तपस्वी मुनियों से घिरे हुए, इन्द्र के समान शोभा पाकर द्वैतवन में सुखपूर्वक विहार करने लगे ॥25-27॥
 
After the departure of Duryodhana, the brave Kuntinandan Yudhishthir along with his brothers, being praised by the people of the lower castes, sitting among the gods, surrounded by all the ascetic sages, started roaming in Dwaitavan happily, getting the beauty like Indra. 25-27॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनमोक्षणे षट्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २४६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनको छुड़ानेसे सम्बन्ध रखनेवाला

दो सौ छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४६॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २८ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)