श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 246: चित्रसेन, अर्जुन तथा युधिष्ठिरका संवाद और दुर्योधनका छुटकारा  »  श्लोक 24-25h
 
 
श्लोक  3.246.24-25h 
वैशम्पायन उवाच
पाण्डवेनाभ्यनुज्ञातो राजा दुर्योधनस्तदा।
प्रणम्य धर्मपुत्रं तु गतेन्द्रिय इवातुर:॥ २४॥
विदीर्यमाणो व्रीडावान् जगाम नगरं प्रति।
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! पाण्डवपुत्र युधिष्ठिर की अनुमति पाकर राजा दुर्योधन अपने पुत्र अजातशत्रु को प्रणाम करके अपने नगर को चला गया। उस समय उसका हृदय उस रोगी के समान पीड़ा से फट रहा था, जिसकी इन्द्रियाँ काम न कर रही हों। उसे अपने कुकृत्य पर बड़ी लज्जा हो रही थी।
 
Vaishampayana says - Janamejaya! After getting the permission of Pandava's son Yudhishthira, king Duryodhan bowed down to his son Ajatashatru and left for his city. At that time his heart was breaking with pain like a patient whose senses are not functioning. He was feeling very ashamed of his misdeed. 24 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)