श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 246: चित्रसेन, अर्जुन तथा युधिष्ठिरका संवाद और दुर्योधनका छुटकारा  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.246.22 
मा स्म तात पुन: कार्षीरीदृशं साहसं क्वचित्।
न हि साहसकर्तार: सुखमेधन्ति भारत॥ २२॥
 
 
अनुवाद
'पिताजी! ऐसा काम फिर कभी मत करना। भारत! जो लोग ऐसा करने की हिम्मत करते हैं, वे कभी सुखी नहीं होते।'
 
‘Father! Never dare to do such a thing again. Bharat! People who dare to do such things are never happy.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)