श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 245: पाण्डवोंके द्वारा गन्धर्वोंकी पराजय  »  श्लोक 28-30h
 
 
श्लोक  3.245.28-30h 
चित्रसेनस्तथोवाच सखायं युधि विद्धि माम्।
चित्रसेनमथालक्ष्य सखायं युधि दुर्बलम्॥ २८॥
संजहारास्त्रमथ तत् प्रसृष्टं पाण्डवर्षभ:।
दृष्ट्वा तु पाण्डवा: सर्वे संहृतास्त्रं धनंजयम्॥ २९॥
संजह्रु: प्रद्रुतानश्वाञ्छरवेगान् धनूंषि च।
 
 
अनुवाद
चित्रसेन ने उससे कहा- 'कुंतीपुत्र! इस युद्ध में मुझे अपना मित्र समझो चित्रसेन।' यह सुनकर अर्जुन ने चित्रसेन की ओर देखा। अपने मित्र को युद्ध में अत्यन्त दुर्बल देखकर महाबली पाण्डव अर्जुन ने अपने धनुष पर चढ़ाया हुआ दिव्यास्त्र समाप्त कर दिया। अर्जुन को अपना अस्त्र समेटते देख समस्त पाण्डवों ने भी अपने दौड़ते हुए घोड़े रोक दिए और बड़े वेग से छोड़े जा रहे बाणों और धनुषों का प्रयोग बंद कर दिया।
 
Chitrasena said to him- 'Kunti's son! In this war, consider me as your friend Chitrasena.' Hearing this, Arjuna looked at Chitrasena. Seeing his friend very weak in the war, the great Pandava Arjuna ended the divine weapon that he had displayed on his bow. Seeing Arjuna collecting his weapon, all the Pandavas also stopped their running horses and stopped the use of arrows and bows that were being fired with great force. 28-29 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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