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mahabharat 3.245.26: उस समय अर्जुन अनेक रूप धारण किए हुए प्रतीत हुए (क्योंकि वे युद्धस्थल में सर्वत्र विचरण कर रहे थे) उन्होंने कुपित होकर अपने वचनों द्वारा चित्रसेन के अन्तर्यामी मोह को नष्ट कर दिया॥ 26॥   |   mahabharat अध्याय 3.245: पाण्डवोंके द्वारा गन्धर्वोंकी पराजय   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 245: पाण्डवोंके द्वारा गन्धर्वोंकी पराजय  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  3.245.26 
अन्तर्धानवधं चास्य चक्रे क्रुद्धोऽर्जुनस्तदा।
शब्दवेधं समाश्रित्य बहुरूपो धनंजय:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
उस समय अर्जुन अनेक रूप धारण किए हुए प्रतीत हुए (क्योंकि वे युद्धस्थल में सर्वत्र विचरण कर रहे थे) उन्होंने कुपित होकर अपने वचनों द्वारा चित्रसेन के अन्तर्यामी मोह को नष्ट कर दिया॥ 26॥
 
At that time Arjuna appeared to have assumed many forms (because he was wandering everywhere on the battlefield). Infuriated, he destroyed Chitrasena's illusion of the inner world by using his words.॥ 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)