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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 243: युधिष्ठिरका भीमसेनको गन्धर्वोंके हाथसे कौरवोंको छुड़ानेका आदेश और इसके लिये अर्जुनकी प्रतिज्ञा  »  श्लोक d5-d6
 
 
श्लोक  3.243.d5-d6 
द्यूतकाले हि कौन्तेय वृजिनानि कृतानि वै।
द्रौपद्याश्च परामर्श: केशग्रहणमेव च॥
वस्त्रापहरणं चैव सभामध्ये कृतानि वै।
पुरा कृतानां पापानां फलं भुङ्‍‍क्ते सुयोधन:॥
 
 
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! उसने जुए के दौरान अनेक महापाप किए हैं। द्रौपदी को छूना, उसके बाल खींचना और उसके वस्त्र छीनकर उसे दरबार में नग्न करना - ये सब दुर्योधन के ही पाप हैं। आज दुर्योधन अपने पूर्वकृत पापों का फल भोग रहा है।
 
O son of Kunti! He has committed many great sins during the gambling. Touching Draupadi, pulling her hair and snatching her clothes to make her naked in the court - all these are the evil deeds of Duryodhan. Today, Duryodhan is suffering the consequences of his sins committed earlier.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)