श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 243: युधिष्ठिरका भीमसेनको गन्धर्वोंके हाथसे कौरवोंको छुड़ानेका आदेश और इसके लिये अर्जुनकी प्रतिज्ञा  »  श्लोक d16-d17h
 
 
श्लोक  3.243.d16-d17h 
वैशम्पायन उवाच
एवं विलपमानस्य कौरवस्यार्तया गिरा।
श्रुत्वा विलापं सम्भ्रान्तो घृणयाभिपरिप्लुत:॥
युधिष्ठिर: पुनर्वाक्यं भीमसेनमथाब्रवीत्।)
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! दुर्योधन का इस प्रकार करुण क्रंदन सुनकर महामना युधिष्ठिर दया से द्रवित हो गए। उन्होंने भीमसेन से पुनः कहा-
 
Vaishampayana says- Janamejaya! Hearing the pitiful cries of Duryodhan in this way, the honourable Yudhishthira was moved with pity. He again said to Bhimasena-
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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