श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 243: युधिष्ठिरका भीमसेनको गन्धर्वोंके हाथसे कौरवोंको छुड़ानेका आदेश और इसके लिये अर्जुनकी प्रतिज्ञा  »  श्लोक d1-4
 
 
श्लोक  3.243.d1-4 
(परै: परिभवे प्राप्ते वयं पञ्चोत्तरं शतम्।
परस्परविरोधे तु वयं पञ्च शतं तु ते॥ )
जानात्येष हि दुर्बुद्धिरस्मानिह चिरोषितान्।
स एवं परिभूयास्मानकार्षीदिदमप्रियम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
हम एक सौ पाँच भाई हैं और दूसरों के हाथों पराजय का सामना करने को तैयार हैं। हम पाँचों भाई तभी अलग होते हैं जब हममें आपस में झगड़ा होता है और वे सौ भाई अलग हो जाते हैं। यह मिथ्या बुद्धि वाला गंधर्व जानता है कि हम (पांडव) बहुत समय से यहाँ रह रहे हैं, फिर भी इस चित्रसेन गंधर्व ने हमारा इस प्रकार अपमान करके ऐसा अप्रिय कार्य किया है॥4॥
 
We are 105 brothers and are ready to face defeat at the hands of others. We five brothers are separate only when there is conflict among us and those hundred brothers are separate. This Gandharva with a wrong intellect knows that we (Pandavas) have been living here for a long time, yet this Chitrasen Gandharva has done such an unpleasant act by insulting us in this manner.॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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