श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 243: युधिष्ठिरका भीमसेनको गन्धर्वोंके हाथसे कौरवोंको छुड़ानेका आदेश और इसके लिये अर्जुनकी प्रतिज्ञा  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.243.12 
क इहार्यो भवेत् त्राणमभिधावेति नोदित:।
प्राञ्जलिं शरणापन्नं दृष्ट्वा शत्रुमपि ध्रुवम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में ऐसा कौन महापुरुष है जो शत्रु को हाथ जोड़कर शरण मांगते देखकर और उसे 'भागो, बचाओ' पुकारते सुनकर उसकी रक्षा के लिए न दौड़े?॥12॥
 
Who is such a great man in this world who, on seeing an enemy seeking refuge with folded hands and hearing him cry out 'run, save', would not run to protect him?॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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