श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 243: युधिष्ठिरका भीमसेनको गन्धर्वोंके हाथसे कौरवोंको छुड़ानेका आदेश और इसके लिये अर्जुनकी प्रतिज्ञा  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.243.11 
य एव कश्चिद् राजन्य: शरणार्थमिहागतम्।
परं शक्त्याभिरक्षेत किं पुनस्त्वं वृकोदर॥ ११॥
 
 
अनुवाद
भीमसेन! एक साधारण क्षत्रिय भी अपनी पूरी शक्ति से शरणागत की रक्षा करता है। फिर आप जैसे वीर पुरुष द्वारा शरणागत की रक्षा के विषय में क्या कहा जा सकता है?॥ 11॥
 
Bhimsena! Even an ordinary Kshatriya protects a person who comes to seek refuge to the best of his ability. Then what can be said about a brave man like you protecting a person who seeks refuge?॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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