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श्लोक 3.241.32  |
ततो रथादवप्लुत्य सूतपुत्रोऽसिचर्मभृत्।
विकर्णरथमास्थाय मोक्षायाश्वानचोदयत्॥ ३२॥ |
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| अनुवाद |
| तब सारथीपुत्र कर्ण तलवार और ढाल हाथ में लेकर रथ से उतर पड़ा और विकर्ण के रथ पर बैठकर उसके प्राण बचाने के लिए उसके घोड़ों को जोर-जोर से हांकने लगा। |
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| Then Karna, the son of a charioteer, leapt from his chariot, sword and shield in his hands, and sitting on Vikarna's chariot, began to drive his horses vigorously to save his life. |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि कर्णपराभवे एकचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २४१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें कर्णपराजयविषयक
दो सौ इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४१॥ |
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