श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 240: दुर्योधनका सेनासहित वनमें जाकर गौओंकी देखभाल करना और उसके सैनिकों एवं गन्धर्वोंमें परस्पर कटु संवाद  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  3.240.12-13 
गोरसानुपयुञ्जान उपभोगांश्च भारत।
पश्यन् स रमणीयानि वनान्युपवनानि च॥ १२॥
मत्तभ्रमरजुष्टानि बर्हिणाभिरुतानि च।
अगच्छदानुपूर्व्येण पुण्यं द्वैतवनं सर:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
भरतनंदन! दुर्योधन अपने साथियों के साथ दूध आदि गौ-उत्पादों का भोग करता हुआ नाना प्रकार के सुखों का आनंद लेने लगा और वहाँ के सुन्दर वनों और उद्यानों की शोभा देखने लगा। उनमें मदमस्त भौंरे गुंजार कर रहे थे और मोरों का मधुर शब्द सर्वत्र गूँज रहा था। इस प्रकार धीरे-धीरे आगे बढ़ता हुआ वह द्वैतवन नामक परम पवित्र सरोवर के निकट पहुँचा॥ 12-13॥
 
Bharatanandan! Duryodhan, along with his companions, used to enjoy milk and other cow products and started enjoying various types of pleasures and started seeing the beauty of the beautiful forests and gardens there. Intoxicated bumblebees were humming in them and the sweet voice of peacocks was echoing everywhere. Thus, gradually moving ahead, he reached near the most sacred lake named Dwaitavan.॥ 12-13॥
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