vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 3: वन पर्व
»
अध्याय 239: कर्ण आदिके द्वारा द्वैतवनमें जानेका प्रस्ताव, राजा धृतराष्ट्रकी अस्वीकृति, शकुनिका समझाना, धृतराष्ट्रका अनुमति देना तथा दुर्योधनका प्रस्थान
»
श्लोक 22
श्लोक
3.239.22
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त: शकुनिना धृतराष्ट्रो जनेश्वर:।
दुर्योधनं सहामात्यमनुजज्ञे न कामत:॥ २२॥
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं- जनमेजय! जब शकुनि ने ऐसा कहा तो राजा धृतराष्ट्र ने अपनी अनिच्छा के बावजूद दुर्योधन और उसके मंत्रियों को वहां जाने की अनुमति दे दी।
Vaishmpayana says - Janamejaya! When Shakuni said this, King Dhritarashtra, despite his reluctance, permitted Duryodhan and his ministers to go there.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×