Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.239.10: तू सदैव अहंकार और मोह से भरा रहता है; अतः तू अवश्य ही उनके प्रति अपराध करेगा। ऐसी स्थिति में वे तुझे भस्म किए बिना नहीं छोड़ेंगे। क्योंकि उनमें तप का बल विद्यमान है॥10॥ | mahabharat अध्याय 3.239: कर्ण आदिके द्वारा द्वैतवनमें जानेका प्रस्ताव, राजा धृतराष्ट्रकी अस्वीकृति, शकुनिका समझाना, धृतराष्ट्रका अनुमति देना तथा दुर्योधनका प्रस्थान । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
यूयं चाप्यपराध्येयुर्दर्पमोहसमन्विता:।
ततो विनिर्दहेयुस्ते तपसा हि समन्विता:॥ १०॥
अनुवाद
तू सदैव अहंकार और मोह से भरा रहता है; अतः तू अवश्य ही उनके प्रति अपराध करेगा। ऐसी स्थिति में वे तुझे भस्म किए बिना नहीं छोड़ेंगे। क्योंकि उनमें तप का बल विद्यमान है॥10॥
You are always full of ego and attachment; hence you will definitely commit a crime against them. In that condition they will not leave you without burning you to ashes. Because the power of penance is present in them.॥10॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥