श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 239: कर्ण आदिके द्वारा द्वैतवनमें जानेका प्रस्ताव, राजा धृतराष्ट्रकी अस्वीकृति, शकुनिका समझाना, धृतराष्ट्रका अनुमति देना तथा दुर्योधनका प्रस्थान  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.239.1 
वैशम्पायन उवाच
धृतराष्ट्रं तत: सर्वे ददृशुर्जनमेजय।
पृष्ट्वा सुखमथो राज्ञ: पृष्टा राज्ञा च भारत॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - हे भरतपुत्र जनमेजय! तत्पश्चात् वे सब राजा धृतराष्ट्र से मिले। उन्होंने राजा का कुशलक्षेम पूछा और राजा ने भी उनका कुशलक्षेम पूछा॥1॥
 
Vaishampayana says- O son of Bharatana, Janamejaya! Thereafter all of them met King Dhritarashtra. They enquired about the well-being of the king and the king enquired about their well-being.॥1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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