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mahabharat 3.238.2: कर्ण! जो कुछ तुम कह रहे हो, वह मेरे मन में भी है। परन्तु जहाँ पाण्डव रहते हैं, वहाँ जाने के लिए मैं पिता की अनुमति नहीं पा सकूँगा॥ 2॥   |   mahabharat अध्याय 3.238: दुर्योधनके द्वारा कर्ण और शकुनिकी मन्त्रणा स्वीकार करना तथा कर्ण आदिका घोषयात्राको निमित्त बनाकर द्वैतवनमें जानेके लिये धृतराष्ट्रसे आज्ञा लेने जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 238: दुर्योधनके द्वारा कर्ण और शकुनिकी मन्त्रणा स्वीकार करना तथा कर्ण आदिका घोषयात्राको निमित्त बनाकर द्वैतवनमें जानेके लिये धृतराष्ट्रसे आज्ञा लेने जाना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.238.2 
ब्रवीषि यदिदं कर्ण सर्वं मनसि मे स्थितम्।
न त्वभ्यनुज्ञां लप्स्यामि गमने यत्र पाण्डवा:॥ २॥
 
 
अनुवाद
कर्ण! जो कुछ तुम कह रहे हो, वह मेरे मन में भी है। परन्तु जहाँ पाण्डव रहते हैं, वहाँ जाने के लिए मैं पिता की अनुमति नहीं पा सकूँगा॥ 2॥
 
Karna! Whatever you are saying is in my mind too. But I will not be able to get father's permission to go to the place where the Pandavas live.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)