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mahabharat 3.238.1: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! कर्ण की बात सुनकर राजा दुर्योधन पहले तो बहुत प्रसन्न हुआ, फिर विनम्र होकर इस प्रकार बोला -॥1॥   |   mahabharat अध्याय 3.238: दुर्योधनके द्वारा कर्ण और शकुनिकी मन्त्रणा स्वीकार करना तथा कर्ण आदिका घोषयात्राको निमित्त बनाकर द्वैतवनमें जानेके लिये धृतराष्ट्रसे आज्ञा लेने जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 238: दुर्योधनके द्वारा कर्ण और शकुनिकी मन्त्रणा स्वीकार करना तथा कर्ण आदिका घोषयात्राको निमित्त बनाकर द्वैतवनमें जानेके लिये धृतराष्ट्रसे आज्ञा लेने जाना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.238.1 
वैशम्पायन उवाच
कर्णस्य वचनं श्रुत्वा राजा दुर्योधनस्तत:।
हृष्टो भूत्वा पुनर्दीन इदं वचनमब्रवीत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! कर्ण की बात सुनकर राजा दुर्योधन पहले तो बहुत प्रसन्न हुआ, फिर विनम्र होकर इस प्रकार बोला -॥1॥
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! On hearing Karna's words, king Duryodhan was first very happy; then he became humble and spoke thus -॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)