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mahabharat 3.237.6-7h: 'राजन्! आपके शत्रु शोक से दुर्बल और दुखी हो गए हैं। हे महाबाहो! आपने अपनी बुद्धि से राजा युधिष्ठिर से इस देवी लक्ष्मी को छीन लिया है। अतः अब यह आपके समक्ष चमकती हुई प्रतीत हो रही है।'   |   mahabharat अध्याय 3.237: शकुनि और कर्णका दुर्योधनकी प्रशंसा करते हुए उसे वनमें पाण्डवोंके पास चलनेके लिये उभाड़ना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 237: शकुनि और कर्णका दुर्योधनकी प्रशंसा करते हुए उसे वनमें पाण्डवोंके पास चलनेके लिये उभाड़ना  »  श्लोक 6-7h
 
 
श्लोक  3.237.6-7h 
शत्रवस्तव राजेन्द्र न चिरं शोककर्शिता:।
सा तु बुद्धिबलेनेयं राज्ञस्तस्माद् युधिष्ठिरात्॥ ६॥
त्वयाऽऽक्षिप्ता महाबाहो दीप्यमानेव दृश्यते।
 
 
अनुवाद
'राजन्! आपके शत्रु शोक से दुर्बल और दुखी हो गए हैं। हे महाबाहो! आपने अपनी बुद्धि से राजा युधिष्ठिर से इस देवी लक्ष्मी को छीन लिया है। अतः अब यह आपके समक्ष चमकती हुई प्रतीत हो रही है।'
 
‘King! Your enemies have become weak and miserable due to grief. O mighty-armed one! You have snatched this goddess Lakshmi from King Yudhishthira with your intelligence. Hence, now it appears to be shining in your presence.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)