Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.237.5: महाराज! जब हम इन्द्रप्रस्थ गए थे, तब युधिष्ठिर के यहाँ जो राजसी लक्ष्मी हमें चमकती हुई दिखाई देती थीं, वही आज आपके यहाँ चमकती हुई दिखाई दे रही हैं॥5॥   |   mahabharat अध्याय 3.237: शकुनि और कर्णका दुर्योधनकी प्रशंसा करते हुए उसे वनमें पाण्डवोंके पास चलनेके लिये उभाड़ना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 237: शकुनि और कर्णका दुर्योधनकी प्रशंसा करते हुए उसे वनमें पाण्डवोंके पास चलनेके लिये उभाड़ना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.237.5 
इन्द्रप्रस्थगते यां तां दीप्यमानां युधिष्ठिरे।
अपश्याम श्रियं राजन् दृश्यते सा तवाद्य वै॥ ५॥
 
 
अनुवाद
महाराज! जब हम इन्द्रप्रस्थ गए थे, तब युधिष्ठिर के यहाँ जो राजसी लक्ष्मी हमें चमकती हुई दिखाई देती थीं, वही आज आपके यहाँ चमकती हुई दिखाई दे रही हैं॥5॥
 
Maharaj! The same royal goddess Lakshmi that we used to see shining at Yudhishthira's place when we went to Indraprastha, is seen shining at your place today. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)