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श्लोक 3.237.23  |
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा तु राजानं कर्ण: शकुनिना सह।
तूष्णीम्बभूवतुरुभौ वाक्यान्ते जनमेजय॥ २३॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायन कहते हैं: जनमेजय! दुर्योधन से इतना कहकर शकुनि और कर्ण दोनों चुप हो गये। |
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| Vaishmpayana says: Janamejaya! Having said this to Duryodhana, both Shakuni and Karna became silent. |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि कर्णशकुनिवाक्ये सप्तत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २३७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें कर्ण और शकुनिके वचनविषयक
दो सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २३७॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/२ श्लोक मिलाकर कुल २४ १/२ श्लोक हैं।) |
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