Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.237.19-20: नृपश्रेष्ठ! शत्रुओं की दुर्दशा देखकर मनुष्य को जो सुख मिलता है, वह धन, पुत्र और राज्य पाकर नहीं मिलता। हममें से ऐसा कौन सा सुख होगा जो आत्मसाक्षात्कार की इच्छा से आश्रम में वल्कल और मृगचर्म धारण किए हुए अर्जुन को देखकर न मिले? 19-20॥ | mahabharat अध्याय 3.237: शकुनि और कर्णका दुर्योधनकी प्रशंसा करते हुए उसे वनमें पाण्डवोंके पास चलनेके लिये उभाड़ना । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
न पुत्रधनलाभेन न राज्येनापि विन्दति।
प्रीतिं नृपतिशार्दूल याममित्राघदर्शनात्॥ १९॥
किं नु तस्य सुखं न स्यादाश्रमे यो धनंजयम्।
अभिवीक्षेत सिद्धार्थो वल्कलाजिनवाससम्॥ २०॥
अनुवाद
नृपश्रेष्ठ! शत्रुओं की दुर्दशा देखकर मनुष्य को जो सुख मिलता है, वह धन, पुत्र और राज्य पाकर नहीं मिलता। हममें से ऐसा कौन सा सुख होगा जो आत्मसाक्षात्कार की इच्छा से आश्रम में वल्कल और मृगचर्म धारण किए हुए अर्जुन को देखकर न मिले? 19-20॥
Nrupashrestha! The happiness that a man gets from seeing the plight of his enemies is not equal to that of getting wealth, sons and kingdom. Whichever happiness among us will not be achieved by seeing Arjun in the ashram wearing valkal and deerskin, having aspired to self-realization? 19-20॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥