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mahabharat 3.237.18: ‘जैसे पर्वत की चोटी पर खड़ा हुआ मनुष्य पृथ्वी पर स्थित समस्त वस्तुओं को तुच्छ और छोटा देखता है, वैसे ही जो मनुष्य स्वयं सुखी होकर अपने शत्रुओं को संकट में देखता है, उसके लिए इससे बढ़कर सुख की बात और क्या हो सकती है?॥18॥   |   mahabharat अध्याय 3.237: शकुनि और कर्णका दुर्योधनकी प्रशंसा करते हुए उसे वनमें पाण्डवोंके पास चलनेके लिये उभाड़ना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 237: शकुनि और कर्णका दुर्योधनकी प्रशंसा करते हुए उसे वनमें पाण्डवोंके पास चलनेके लिये उभाड़ना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.237.18 
समस्थो विषमस्थान् हि दुर्हृदो योऽभिवीक्षते।
जगतीस्थानिवाद्रिस्थ: किमत: परमं सुखम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
‘जैसे पर्वत की चोटी पर खड़ा हुआ मनुष्य पृथ्वी पर स्थित समस्त वस्तुओं को तुच्छ और छोटा देखता है, वैसे ही जो मनुष्य स्वयं सुखी होकर अपने शत्रुओं को संकट में देखता है, उसके लिए इससे बढ़कर सुख की बात और क्या हो सकती है?॥18॥
 
‘Just as a man standing on the top of a mountain sees all the things situated on the ground as low and small, similarly for a man who himself is happy and sees his enemies in trouble, what can be more pleasurable than this?॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)