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mahabharat 3.237.17: हे प्रजापालक राजा! जो लक्ष्मी मनुष्य में प्रकाशित होती है तथा उसके मित्र और शत्रु दोनों उसे देखते हैं, वही बलवान है॥17॥   |   mahabharat अध्याय 3.237: शकुनि और कर्णका दुर्योधनकी प्रशंसा करते हुए उसे वनमें पाण्डवोंके पास चलनेके लिये उभाड़ना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 237: शकुनि और कर्णका दुर्योधनकी प्रशंसा करते हुए उसे वनमें पाण्डवोंके पास चलनेके लिये उभाड़ना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.237.17 
यां श्रियं सुहृदश्चैव दुर्हृदश्च विशाम्पते।
पश्यन्ति पुरुषे दीप्तां सा समर्था भवत्युत॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे प्रजापालक राजा! जो लक्ष्मी मनुष्य में प्रकाशित होती है तथा उसके मित्र और शत्रु दोनों उसे देखते हैं, वही बलवान है॥17॥
 
People's guardian king! The Lakshmi who shines in a man and is seen by both his friends and enemies, is the only one who is strong. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)