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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 237: शकुनि और कर्णका दुर्योधनकी प्रशंसा करते हुए उसे वनमें पाण्डवोंके पास चलनेके लिये उभाड़ना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.237.1 
वैशम्पायन उवाच
धृतराष्ट्रस्य तद् वाक्यं निशम्य शकुनिस्तदा।
दुर्योधनमिदं काले कर्णेन सहितोऽब्रवीत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं: जनमेजय! धृतराष्ट्र के पूर्वोक्त वचन सुनकर उस समय शकुनि ने अवसर देखकर कर्ण सहित दुर्योधन से इस प्रकार कहा:॥1॥
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! On hearing the aforesaid words of Dhritarashtra, at that time Shakuni along with Karna, seeing the opportunity, said to Duryodhan thus:॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)