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mahabharat 3.236.10: जिन राजा युधिष्ठिर को एक समय मगध और सूतगण प्रतिदिन मंत्रोच्चार करके जगाते थे, जो स्वयं इन्द्र के समान तेजस्वी और पराक्रमी हैं, वे ही अब भूमि पर सोते होंगे और रात्रि के अन्तिम पहर में पक्षियों का कलरव सुनकर जाग उठते होंगे।॥10॥   |   mahabharat अध्याय 3.236: पाण्डवोंका समाचार सुनकर धृतराष्ट्रका खेद और चिन्तापूर्ण उद्‍गार   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 236: पाण्डवोंका समाचार सुनकर धृतराष्ट्रका खेद और चिन्तापूर्ण उद्‍गार  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.236.10 
प्रबोध्यते मागधसूतपूगै-
र्नित्यं स्तुवद्भि: स्वयमिन्द्रकल्प:।
पतत्त्रिसङ्घै: स जघन्यरात्रे
प्रबोध्यते नूनमिडातलस्थ:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
जिन राजा युधिष्ठिर को एक समय मगध और सूतगण प्रतिदिन मंत्रोच्चार करके जगाते थे, जो स्वयं इन्द्र के समान तेजस्वी और पराक्रमी हैं, वे ही अब भूमि पर सोते होंगे और रात्रि के अन्तिम पहर में पक्षियों का कलरव सुनकर जाग उठते होंगे।॥10॥
 
The same King Yudhishthira who was once woken up by the Magadhs and Sutas by chanting hymns every day, who is as radiant and powerful as Indra himself, must now be sleeping on the ground and waking up in the late hours of the night on hearing the chirping of birds.'॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)