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mahabharat 3.235.18: तत्पश्चात् भामिनी सत्यभामा श्रीकृष्ण के रथ पर सवार हुईं। यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्ण ने मुस्कुराकर द्रौपदी को सान्त्वना दी और उसे लौटाकर वे तीव्रगामी घोड़ों पर सवार होकर अपनी पुरी द्वारका के लिए चले गए॥18॥   |   mahabharat अध्याय 3.235: सत्यभामाका द्रौपदीको आश्वासन देकर श्रीकृष्णके साथ द्वारकाको प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 235: सत्यभामाका द्रौपदीको आश्वासन देकर श्रीकृष्णके साथ द्वारकाको प्रस्थान  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.235.18 
आरुरोह रथं शौरे: सत्यभामाथ भाविनी।
स्मयित्वा तु यदुश्रेष्ठो द्रौपदीं परिसान्त्व्य च।
उपावर्त्य तत: शीघ्रैर्हयै: प्रायात् पुरं स्वकम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् भामिनी सत्यभामा श्रीकृष्ण के रथ पर सवार हुईं। यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्ण ने मुस्कुराकर द्रौपदी को सान्त्वना दी और उसे लौटाकर वे तीव्रगामी घोड़ों पर सवार होकर अपनी पुरी द्वारका के लिए चले गए॥18॥
 
Thereafter Bhamini Satyabhama mounted the chariot of Shri Krishna. Shri Krishna, the best of Yadu, smiled and consoled Draupadi and after returning her, he left for his Puri Dwarka on fast moving horses. 18॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्वणि कृष्णगमने पञ्चत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २३५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्वमें श्रीकृष्णका द्वारकाको प्रस्थानविषयक दो सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २३५॥

 
 
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