श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 234: पतिदेवको अनुकूल करनेका उपाय—पतिकी अनन्यभावसे सेवा  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  3.234.4-5 
सुखं सुखेनेह न जातु लभ्यं
दु:खेन साध्वी लभते सुखानि।
सा कृष्णमाराधय सौहृदेन
प्रेम्णा च नित्यं प्रतिकर्मणा च॥ ४॥
तथाऽऽसनैश्चारुभिरग्रमाल्यै-
र्दाक्षिण्ययोगैर्विविधैश्च गन्धै:।
अस्या: प्रियोऽस्मीति यथा विदित्वा
त्वामेव संश्लिष्यति तद् विधत्स्व॥ ५॥
 
 
अनुवाद
सखी! इस संसार में भोग से कभी सुख नहीं मिलता। पतिव्रता स्त्री दुःख सहकर ही सुख प्राप्त करती है। तुम सदा स्नेह, प्रेम, सुन्दर वस्त्र, सुन्दर आसन, सुन्दर पुष्पमाला, उदारता, सुगन्धित द्रव्य और व्यवहारकुशलता से श्यामसुन्दर की पूजा करो। उनके साथ ऐसा व्यवहार करो कि वे मुझे सत्यभामा से अधिक प्रिय समझकर सम्पूर्ण हृदय से तुम्हारा आलिंगन करें॥ 4-5॥
 
Sakhi! In this world, happiness is never attained through pleasure. A faithful wife attains happiness only by enduring pain. You should constantly worship Shyamsundar with cordiality, love, beautiful clothes, offering of a beautiful seat, beautiful garland of flowers, generosity, fragrant substances and tactfulness. Behave with him in such a way that he, thinking that I am dearer to Satyabhama, embraces you with all his heart.॥ 4-5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)