श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 233: द्रौपदीका सत्यभामाको सती स्त्रीके कर्तव्यकी शिक्षा देना  »  श्लोक 7-8
 
 
श्लोक  3.233.7-8 
व्रतचर्या तपो वापि स्नानमन्त्रौषधानि वा।
विद्यावीर्यं मूलवीर्यं जपहोमागदास्तथा॥ ७॥
ममाद्याचक्ष्व पाञ्चालि यशस्यं भगदैवतम्।
येन कृष्णे भवेन्नित्यं मम कृष्णो वशानुग:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
पांचालकुमारी कृष्णा! आज आप कृपा करके मुझे ऐसे व्रत, तप, स्नान, मंत्र, औषधि, ज्ञान-शक्ति, मूल-शक्ति (जड़ी-बूटियों का प्रभाव), जप, होम या औषधि के बारे में बताइए, जिससे यश और सौभाग्य की वृद्धि हो और जिससे श्यामसुन्दर सदैव मेरे वश में रहें। ॥7-8॥
 
Panchalkumari Krishna! Today please tell me about such a fast, penance, bath, mantra, medicine, knowledge-power, root-power (effect of herbs), chanting, homa or medicine, which will increase fame and good fortune and by which Shyamsundar will always remain under my control.' ॥ 7-8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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