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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 233: द्रौपदीका सत्यभामाको सती स्त्रीके कर्तव्यकी शिक्षा देना  »  श्लोक 60-61
 
 
श्लोक  3.233.60-61 
वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा धर्मसहितं व्याहृतं कृष्णया तदा।
उवाच सत्या सत्कृत्य पाञ्चालीं धर्मचारिणीम्॥ ६०॥
अभिपन्नास्मि पाञ्चालि याज्ञसेनि क्षमस्व मे।
कामकार: सखीनां हि सोपहासं प्रभाषितम्॥ ६१॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! द्रौपदी के ये धर्मयुक्त वचन सुनकर सत्यभामा ने उस धर्मात्मा पांचाली का आदर करते हुए कहा- 'पांचाल की राजकुमारी! यज्ञसेनी! मैं आपकी शरण में आई हूँ; (मैंने जो अनुचित प्रश्न पूछा है, उसके लिए मुझे क्षमा करें। ऐसी विनोदपूर्ण बातें सखियों में स्वतः ही हो जाती हैं।'॥60-61॥
 
Vaishmpayana says- Janamejaya! On hearing these righteous words of Draupadi, Satyabhama, while respecting that righteous Panchali, said- 'Princess of Panchala! Yajnaseni! I have come to your refuge; (forgive me for the inappropriate question I have asked. Such joking and humorous talks happen voluntarily among friends.'॥ 60-61॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्वणि त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २३३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीसत्यभामा-संवादपर्वमें दो सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २३३॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ६२ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)